Wednesday, 8 April 2020

दामिनी दामन हैं तुम्हारा पाक ,तुम बिजली हो विश्व को दो प्रकाश ,
खोलो  तुम आँखे देखो कितने खड़े है तुम्हारे  साथ
बन जाओ प्रेरणा जीने की तुम लेकर मन में एक विश्वास
तुम होगी कामयाब हम सब का है पूर्ण विश्वास
तुम में है जिजीविषा
जिस राह तुम हो उस से मंजिल है बहुत पास
सफ़दर जंग में  तुम लड़ रही हो जो जंग
उठो जिन्दगी तुमें बुला रही है खड़े है सारे देशवासी
तुम्हारे संग
सफलता कदम चूमने को है आतुर
उसके हाथो है तुम्हारे के लिए जिंदगी का उपहार
(26-12-2012)
#विषधर कहता है:-

तरुणाई की ओढ़ दुशाला,क्यों भटकती हो निर्जन वन में?
महकाती फिरती कलियों को इस बंजर मधुवन में। 
कटीली झाड़ियां उलझ ना जाए उफनते यौवन में।।
चलना सँभल कर इन बेरहम पगडंडियों पर
#विषधर कहीं नज़र ना लग जाये गिद्धों की भोलेपन पर।।
विषधर कहता है:-

सेवा निवृति के बाद

बिल्डिंग के शीर्ष पर बैठ खिड़की के पार देखता हूँ
पेड़ों की कोमल पत्तियां करती अठखेलियां हवा के साथ और बिछुड़ते हुए भी पेड़ों से
कली को बनते फूल और फिर शोषण करते भोरे को
चिड़ियों की चीं चीं और बिन पर के बच्चे को खिलाते दाना
और पंख उगते ही उसका फुर्र से लंबी उड़ान पर जाना
बिलखता छोड़ माँ बाप को फिर वापस न आना
#विषधर सोचता नम आंखें बंद कर कैसी है ये जग की रीत
जिये थे जिनके लिये उनके दिल में न भावना है और न प्रीत।
आज  प्यासे कौए की दिल्ली में दम घुटने से मौत हो गई।
वह था मेरे  बचपन  का उपदेशक।
उसकी ही शिक्षा थी प्रयत्न करो बार बार,मत मानो तुम हार।
उसने अपनी चेष्टा से कंकडों से निकला पानी
और आज तक जिया।
आज उसी मानुस के कर्मों से।
काँव काँव करते दम घुटने से  मौत की नींद सो गया।
साम्यवाद का जो था अनुयाई
दीपावली के दिन दिल्ली में सदा के लिए अकेले ही सो गया
धिक्कार है! हे स्वयंभू बेरहम बुद्धिजीवी अब तो तू हार गया
अपने देश को ही तूने दीपोत्सव के नाम पर बम से उजाड़ किया
विषधर तू तो विलीन है शून्य में
अब बारी है तेरी आने वाली नस्ल की।
ये सोच  ले।
दिल्ली लॉक्ड डाउन है। 
मैं इसका कैदी हूँ।
अपनी खुशी के लिए।
अपने परिवार के लिए,
अपने पड़ोस के लिए,
अपने मित्र के लिए,
अपनी कॉलोनी के लिए, अपने जनपद के लिए,
अपने राज्य के लिए ,
अपने देश के लिए,
अपने महाद्वीप के लिए,
सारे विश्व के लिए ,
क्योंकि मैं एक भारतीय हूँ।
क्योंकि मैं एक मानव हूँ
मानवता के लिए।
हमारी परंपरा है
अतिथि देवो भवः।
लेकिन मैं मानवता के लिए
तोड़ता हूँ ये परंपरा
थोड़ी दे के लिए भूलता हूँ
अपना धर्म।
नहीं खोलूंगा दरवाजे
इस मानव जाति के दुश्मन के लिए।
मानव है तो मानवता हैं।
मानवता को बचाना है?
तो कोविड-१९  को समूल
नष्ट करना है।
आओ हम सब मिलकर
इस लॉक्ड डाउन का करते है
स्वागत।
हमें घबराना नहीं है
दूर से ही मिलकर रहना है।
ध्यान रखना हैं कि कोई भूखा
सोये नही।
साथ छोड़े नहीं।
विषधर पी लेना विष
मानवता के लिए
रोकना कोरोना
अमर बन नीलकंठ।

क्योंकि ये कोरोना है
हमें कुछ भी करना है
लेकिन रोकना है कोरोना
नहीं है रोना।
कोविड-19 और सेवा निवृत्त का एक साल
 सेवा निवृत्त का एक साल करीब करीब पूर्ण हो गया। शुरू में ऐसा लगता था कि समय स्थिर से हो गया आगे  बढ़ ही नही रहा है। धीरे धीरे सब सामान्य हो गया क्योंकि समय का उपयोग करना आ ही गया। इस मध्य सुख और दुख दोनों स्थितियों से सामना भी किया। छोटी बेटी का विवाह किया और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हुआ। वही बड़े भाई की मृत्यु से बहुत ही दुखः हुआ क्योंकि मुझे अब बड़े भाई  रूपी उस वृक्ष की  छाया कभी भी नसीब नहीं होगी जिस छाया में मैंने अपनी बाल्यवस्था से प्रौढ़ावस्था जी।

 सेवा निवृत्त के एक साल पूरे होने के अंतिम दिनों में एकांतवास और सामाजिक दूरी का पालन कर रहा हूँ  क्यों कि कोरोना से बचना है अपने लिए, अपने परिवार के लिए , अपने पड़ोसियों के लिये ,अपने मित्रों के लिए , अपने देश लिए , विश्व के लिए  और अपने दुश्मन के लिए ......  अरे  मेरा तो कोई भी नहीं दुश्मन है। हाँ एक दुश्मन है मेरा ,आपका , हम सभी का और मानवता का।
इस दुश्मन को हराने के लिए ज़रूरी है एकांत वास सामाजिक दूरी बनाते हुए अपने परिवार के साथ। वह है। .........कोरोना.........

हम सब अर्जुन है क्योंकि हम सबने यह कला ( एकांतवास) तो  माँ के गर्भ में नौ माह रहकर सीखी है। यह समस्या ही नही है।

हम सबने जीना है

मेरी भी जिजीविषा है क्योंकि मुझे अगली पीढ़ी/ नाती पोतों को सीता राम, राधा कृष्ण, ब्रह्मा विष्णु महेश, शिवाजी , चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह ,गाँधी , और #कोरोना#  की भी कहानी सुनानी है।

और..…हाँ ....आप  मित्रों और.... फ़ेसबुक मित्रो .....से रूबरू भी होना है इसलिए एकांतवास ज़रूरी है।


अच्छा फिर  मार्च 2021 के आखरी में फिर मिलते है

मैं तो चला अपने परिवार के साथ एकांतवास में।
आप भी ना.......
परिवर्तन-
1984 से 2019 मध्य।
लगभग तीन दशको से ज्यादा समय में।
जिंदगी किस तरह से बदलती है।
आशा निराशा के मंथन में
नये सपनों के साथ।
अज़ीज़ों से बिछुड़ने पर
जिन्दगी के नए हम सफर के साथ।
अंत फिर वही आड़ी तिरछी लकीरों के जाल में
नई चाँदनी रात की आस में।
विषधर चंद लम्हे खुशी के चुराने की कोशिश की
लेकिन पकड़े गए मोह और ममता के ज़ाल में।

Sunday, 25 August 2013

रिमझिम रिमझिम बरसता पानी

रिमझिम रिमझिम बरसता पानी 
आओ दादी आओ नानी 
जब  पानी  में बहती नाव 
उसमें देखो बच्चों के भाव 
ठुमुक  ठुमुक बहती   नाव
राग एक नया सुनाती  नाव  
बरखा  ने अपना स्वभाव  बदला 
उसके विकराल रूप से दिल दहला 
बहे खेत  और खलियान 
नहीं  बक्शे पहाड़ और मकान 
ताली  बजाकर बच्चे   चिल्लाते
मेरी  नाव सबसे आगे  
कितने ये  नादान  
ये समझते मातम को भी  अपनी शान   
सोने जैसा है  साफ  दिल इनका
इनके दिल में  कोई दाग़  न दिखता   
इनके लिए बरसता  पानी केवल है  रिमझिम  पानी  
चाहे  वो   लिखे उनके जीवन में   मातम की एक कहानी  
'विषधर' कहता अब पछताने से होता क्या
तब कहते थे पेड  कटाने से होता क्या 
और अब कहते  हो वृक्षारोपण से होता क्या
अरे अब तो होश में आ  ऐ  निर्बुधि  इन्सान
अगर चाहत  है बनाना महान 
जीवन में  एक वृक्ष कर दान   

त्रिलोक चन्द्र  जोशी  'विषधर'

Wednesday, 21 August 2013

कर्ज निपटाना भारत माँ का नहीं है इतना आसान

कर्ज निपटाना भारत माँ का नहीं है इतना आसान
आओ मिलकर करे हम इस धरती पर एहसान
धिक्कारें उस निर्माण को
जिसके नीचे है खाली स्थान
जिसमें भरेगा हर नेता 
हर हिंदुस्तानी के खून पसीने से रंगी लिपटी धन दौलत
पैदा होगा एक नेता महान
विषधर कहता फिर भी ये देश
सारे जहां में महान 

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'

अधिक्षप

अधिक्षप (तिरस्कार) स्वीकार नहीं
चाहे तोलो मणियों से
देश भक्ति का मोल नहीं
कणक से बेहतरीन है माटी मेरे देश की
लहू अनमोल, ये है जीने की राह 
गुलामी के लिए जीना क्या
मौत निश्चित फिर पिंजरा क्या
तोड़ जाल दासता का भव्यता क्या
चन्दन है माटी मेरे देश की
देश मेरा चन्दन
करता हूँ ये वंदन
लगे ये चन्दन
भले मैं हूँ यूएस या लन्दन

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'

मुस्कारने की भी अदा होतीं है

मुस्कारने की भी अदा होतीं है
इसमें खुदा की तौफीक छिपी होती है
दिल से निकली आवाज़
तो खुदा की आवाज होती है

त्रिलोक चन्द्र जोशी ' विषधर'

आक्रोश लहरों का नहीं झलकता है पानी में

आक्रोश लहरों का नहीं झलकता है पानी में
विदा होती है फिर न मिलने के लिए मानी (घमंड ) में
हजारों थपेड़े खाए इस अहंकारी ने
अंत में जा मिली 'विषधर' खारे पानी में

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'

ईद के मौके में आओ अब हम गले मिले

इस भाई चारे के पैगाम में शक्ति है अज़ब
एक एक मिलकर हो जातें ग्यारह गज़ब
ईद के मौके में आओ अब हम गले मिले
भूल सरे शिकवा अब एक सदा के लिए हो चले
भूत को भूल भविष्य को रुख करे 
हम भारत की है संतान
फिर क्यों छेड़े अलग अलग तान
दुश्मन से लड़े रख कर सामने आन बान और शान
न टपके भारत माँ का आँसूं एक
चाहे कष्ट आये रस्ते में अनेक
हाथों में हाथ
हो ऐसा साथ
किसी की हिम्मत न हो जो उठा सके भारत माँ पर आँख
ईद के मौके में आओ अब हम गले मिले
भूल सरे शिकवा अब एक सदा के लिए हो चले

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'

बंधनवार

मैं तो एक बंधनवार हूँ धागों में जकड़ा
सिमटा दरवाजे के माथे पर अकड़ा
बिना अपराध भुगत रहा सजा
सदियों से आज तक आगे अनंत
हर मंगल गान में मेरा मान 
सूखे पत्तों में भी मेरा अभिमान
रक्षक हूँ में अपने अपराधी का
भक्षक बन बैठा मालिक ,मेरी लाचारी
हर आने वाला और जाने वाला देखता मुझको
कहता अब तो सूख गया फेंको इसको
कभी कोई अतिथि मुझे
गलती से छूता
मैं टूट अपनों से छूट
उसके चरणों गिर विनती करता
बंध बंध कर बुझ चूका हूँ
तुम आओ जगह मेरी मैं तुम्हारी
मै बंधनवार ये है मेरी लाचारी

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'

माँ

भटक गया हूँ उन जानी पहचानी राहों में
जहाँ खेलता था
माँ की ममता और उसकी की बांहों में
बचपन भी अब मुझे याद नहीं
याद है बस
माँ 
खुद सोती गीले में मुझे सुलाती सूखे में
माँ 
मैं तो मैं बन गया पर माँ अभी भी वो ही
माँ 
माँ के पल्लू में छिप जाता था डर हवा के झोंके से 
वहां मिलती थी ताकत एक
जिसमें थी जीने की अभिलाषा अनेक 
आँचल माँ का मेरी पहली पाठशाला
दुःख भी वहां था सुख से निराला 
ममता माँ की एक झूला 
मैं पचपन का लेकिन अभी तक नहीं भूला
माँ की गोद अभी तक उसका मुझे बोध
अब लाचार खुद बैठने में 
मगर मेरा सिर रखकर गोद में अपनी 
बालों मैं अंगुली फहराती 
दुःख दर्द सरे भूल मैं बालक बन अबोध 
खो जाता माँ के आँचल में 
मन हो जाता मेरा निष्कपट निष्काम 
पहुच जाता बच्चों के धाम 
माँ तो माँ है माँ की कोई नहीं प्रतिलिपि 
दुर्लभ अप्राप्य
भगवान की एक कृति 

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर' 

Sunday, 28 July 2013

ये खेत ये खलियान आत्मा हमारी

ये खेत ये खलियान आत्मा हमारी 
रखो इनका ध्यानआत्मा इनकी हरियाली 
सावन की बूंदे रक्त इनका 
हरी फसल है धमनी 
पशु पक्षी की  की महफिल में
कोयल है संगीतकार 
मयूर करता  नृत्य देख बदली को साभार 
तो ढोलकिया  बने मेढक ने छेड़ा मेघ राग 
बरसा पानी  छन छन करता
पत्तों में वो खन खन  करती 
फिर वो हरियाली  लाई    
' विषधर' कहता अम्मा आओ ताई आओ 
देखो फिर भरा है खलियान
त्रिलोक चंद्र जोशी'विषधर' 

Thursday, 25 July 2013

इंतजार है बंद दरवाजों को खुलने का


  उत्तराखंड के एक बंद मकान की व्यथा जिसका 

  
  मालिक सालों पहले प्रवासी हो गया है वह

  इंतजार कररहा है की कब उसका मालिक आयेगा ? 

  इंतजार है बंद दरवाजों को खुलने का 

 
  निरीह बेजान एवं बेजुबान

 
  दे रहा एकही सन्देश


  कोई तो आयेगा मुझे समझेगा 


  और आज़ा
द करेगा मुझे सदा के लिए
 
  इसी लिए 
मैं सह रहा है समय कि मार
 
  फिर भी वोही इंतजार 


  अब तो आजाओ मेरे 
यार 
 
  आँगन में अभी भी मिलेगी


  वोही बचपन की मस्ती 


  शायद न मिले वो यार


  क्योकि उनके दरवाजे भी


  मेरी तरह कर रहे हैं इंतजार 


   में करूंगा इंतजार अनंत का अनंत त


  आजो घर वापिस मेरी यह पुकार 

  गूँज रही मेरी बेजुबान आवाज़ 


  कोई तो सुनेगा

  ये है म्योर पहाड़ :- द्वारा त्रिलोक चन्द्र जोशी

Wednesday, 24 July 2013

कर्म पथ ,जीवन पथ

कर्म पथ ,जीवन पथ
असीम अभिलाषाओं का अनंत राजपथ
आतप शुष्क बीज की नमता देती अंकुर
आर्ची की कल्पना भी उस पथ पर
दैदीप्त मान करती जीवन रस
दो रूप है अग्नि के
आर्ची और लपट
लपट करती तहस नहस
खँडहर का प्रतीक
आर्ची माध्यम सुर से पंचम सुर तक
अडिग निर्भय
उज्जवल करती जीवन पथ
दीपशिखा आत्मवत
चानन की खुसबू बिखेर यत्र तत्र सर्वत्र

Tuesday, 23 July 2013

उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा में स्वर्गवासी सभी तीर्थ यात्रियों को समर्पित

उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा में स्वर्गवासी सभी तीर्थ यात्रियों को समर्पित

फटा अस्मां
मिटा सिंदूर
द्वार में नाथ के हो गए अनाथ
मांगने गई थी वर
रहे सुहाग मेरा अमर

बह गये सपने जल के सैलाब में
एक लम्बे सफ़र में
अनंत सफ़र में और सिंदूर साथ में

सूने हो गए वो आँगन
जहाँ सुनाई पड़ती थी पायल की खनखन
उखल की धम धम
बच्चों की किलकारियां
माँ की डांट
दादी का प्यार
और पिता की प्यार भरी गालियाँ

जहाँ चढ़ती थी फूलों की चादर
वहां क्षत विक्षित पड़ी हैं लाशें
जो चढ़ाने आये थे जल
उन्होंने ले ली जल समाधी
हो गया सूना शिव का द्वार
देव भूमि पर ये प्रकृति का कहर

ये हाहाकार
सब ढूढ़ ते अपने अपने रिश्तेदार
इधर लाशे उधर लाशें
हर लाश लगती अपनी रिश्तेदार
हाय उत्तराखंड में प्रकृति का कैसा अत्याचार

मत करो अनादर प्रकृति का
विषधर कहता करो रोपण वृक्ष का
आओ अपने प्रिय की याद में हम सब एक एक वृक्ष लगायें
न दो मौका प्रकृति को की वो फिर इतिहास दोहराये

(त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर')

हार को निहार तू मत निहार हार (पराजय )को

हार को निहार तू
मत निहार हार (पराजय )को
लक्ष्य तेरा विजय पथ मत भटक राह
हरी धरा भरी धरा
जा निकट मत भटक
पार कर कंटीली राह
लक्ष्य तेरा विजय पथ मत भटक राह
अकेले आया था धरा पर अकेले तू जायगा
पीछे मुड़कर देख मत
भूत में रह जायेगा
(त्रिलोक चन्द्र जोशी विषधर )