अधिक्षप (तिरस्कार) स्वीकार नहीं
चाहे तोलो मणियों से
देश भक्ति का मोल नहीं
कणक से बेहतरीन है माटी मेरे देश की
लहू अनमोल, ये है जीने की राह
गुलामी के लिए जीना क्या
मौत निश्चित फिर पिंजरा क्या
तोड़ जाल दासता का भव्यता क्या
चन्दन है माटी मेरे देश की
देश मेरा चन्दन
करता हूँ ये वंदन
लगे ये चन्दन
भले मैं हूँ यूएस या लन्दन
त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'
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