#विषधर कहता है:-
तरुणाई की ओढ़ दुशाला,क्यों भटकती हो निर्जन वन में?
महकाती फिरती कलियों को इस बंजर मधुवन में।
कटीली झाड़ियां उलझ ना जाए उफनते यौवन में।।
चलना सँभल कर इन बेरहम पगडंडियों पर
#विषधर कहीं नज़र ना लग जाये गिद्धों की भोलेपन पर।।
तरुणाई की ओढ़ दुशाला,क्यों भटकती हो निर्जन वन में?
महकाती फिरती कलियों को इस बंजर मधुवन में।
कटीली झाड़ियां उलझ ना जाए उफनते यौवन में।।
चलना सँभल कर इन बेरहम पगडंडियों पर
#विषधर कहीं नज़र ना लग जाये गिद्धों की भोलेपन पर।।
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