विषधर कहता है:-
सेवा निवृति के बाद
बिल्डिंग के शीर्ष पर बैठ खिड़की के पार देखता हूँ
पेड़ों की कोमल पत्तियां करती अठखेलियां हवा के साथ और बिछुड़ते हुए भी पेड़ों से
कली को बनते फूल और फिर शोषण करते भोरे को
चिड़ियों की चीं चीं और बिन पर के बच्चे को खिलाते दाना
और पंख उगते ही उसका फुर्र से लंबी उड़ान पर जाना
बिलखता छोड़ माँ बाप को फिर वापस न आना
#विषधर सोचता नम आंखें बंद कर कैसी है ये जग की रीत
जिये थे जिनके लिये उनके दिल में न भावना है और न प्रीत।
सेवा निवृति के बाद
बिल्डिंग के शीर्ष पर बैठ खिड़की के पार देखता हूँ
पेड़ों की कोमल पत्तियां करती अठखेलियां हवा के साथ और बिछुड़ते हुए भी पेड़ों से
कली को बनते फूल और फिर शोषण करते भोरे को
चिड़ियों की चीं चीं और बिन पर के बच्चे को खिलाते दाना
और पंख उगते ही उसका फुर्र से लंबी उड़ान पर जाना
बिलखता छोड़ माँ बाप को फिर वापस न आना
#विषधर सोचता नम आंखें बंद कर कैसी है ये जग की रीत
जिये थे जिनके लिये उनके दिल में न भावना है और न प्रीत।
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