आज प्यासे कौए की दिल्ली में दम घुटने से मौत हो गई।
वह था मेरे बचपन का उपदेशक।
उसकी ही शिक्षा थी प्रयत्न करो बार बार,मत मानो तुम हार।
उसने अपनी चेष्टा से कंकडों से निकला पानी
और आज तक जिया।
आज उसी मानुस के कर्मों से।
काँव काँव करते दम घुटने से मौत की नींद सो गया।
साम्यवाद का जो था अनुयाई
दीपावली के दिन दिल्ली में सदा के लिए अकेले ही सो गया
धिक्कार है! हे स्वयंभू बेरहम बुद्धिजीवी अब तो तू हार गया
अपने देश को ही तूने दीपोत्सव के नाम पर बम से उजाड़ किया
विषधर तू तो विलीन है शून्य में
अब बारी है तेरी आने वाली नस्ल की।
ये सोच ले।
वह था मेरे बचपन का उपदेशक।
उसकी ही शिक्षा थी प्रयत्न करो बार बार,मत मानो तुम हार।
उसने अपनी चेष्टा से कंकडों से निकला पानी
और आज तक जिया।
आज उसी मानुस के कर्मों से।
काँव काँव करते दम घुटने से मौत की नींद सो गया।
साम्यवाद का जो था अनुयाई
दीपावली के दिन दिल्ली में सदा के लिए अकेले ही सो गया
धिक्कार है! हे स्वयंभू बेरहम बुद्धिजीवी अब तो तू हार गया
अपने देश को ही तूने दीपोत्सव के नाम पर बम से उजाड़ किया
विषधर तू तो विलीन है शून्य में
अब बारी है तेरी आने वाली नस्ल की।
ये सोच ले।
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