Thursday, 25 July 2013

इंतजार है बंद दरवाजों को खुलने का


  उत्तराखंड के एक बंद मकान की व्यथा जिसका 

  
  मालिक सालों पहले प्रवासी हो गया है वह

  इंतजार कररहा है की कब उसका मालिक आयेगा ? 

  इंतजार है बंद दरवाजों को खुलने का 

 
  निरीह बेजान एवं बेजुबान

 
  दे रहा एकही सन्देश


  कोई तो आयेगा मुझे समझेगा 


  और आज़ा
द करेगा मुझे सदा के लिए
 
  इसी लिए 
मैं सह रहा है समय कि मार
 
  फिर भी वोही इंतजार 


  अब तो आजाओ मेरे 
यार 
 
  आँगन में अभी भी मिलेगी


  वोही बचपन की मस्ती 


  शायद न मिले वो यार


  क्योकि उनके दरवाजे भी


  मेरी तरह कर रहे हैं इंतजार 


   में करूंगा इंतजार अनंत का अनंत त


  आजो घर वापिस मेरी यह पुकार 

  गूँज रही मेरी बेजुबान आवाज़ 


  कोई तो सुनेगा

  ये है म्योर पहाड़ :- द्वारा त्रिलोक चन्द्र जोशी

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