Sunday, 28 July 2013

ये खेत ये खलियान आत्मा हमारी

ये खेत ये खलियान आत्मा हमारी 
रखो इनका ध्यानआत्मा इनकी हरियाली 
सावन की बूंदे रक्त इनका 
हरी फसल है धमनी 
पशु पक्षी की  की महफिल में
कोयल है संगीतकार 
मयूर करता  नृत्य देख बदली को साभार 
तो ढोलकिया  बने मेढक ने छेड़ा मेघ राग 
बरसा पानी  छन छन करता
पत्तों में वो खन खन  करती 
फिर वो हरियाली  लाई    
' विषधर' कहता अम्मा आओ ताई आओ 
देखो फिर भरा है खलियान
त्रिलोक चंद्र जोशी'विषधर' 

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