Wednesday, 21 August 2013

माँ

भटक गया हूँ उन जानी पहचानी राहों में
जहाँ खेलता था
माँ की ममता और उसकी की बांहों में
बचपन भी अब मुझे याद नहीं
याद है बस
माँ 
खुद सोती गीले में मुझे सुलाती सूखे में
माँ 
मैं तो मैं बन गया पर माँ अभी भी वो ही
माँ 
माँ के पल्लू में छिप जाता था डर हवा के झोंके से 
वहां मिलती थी ताकत एक
जिसमें थी जीने की अभिलाषा अनेक 
आँचल माँ का मेरी पहली पाठशाला
दुःख भी वहां था सुख से निराला 
ममता माँ की एक झूला 
मैं पचपन का लेकिन अभी तक नहीं भूला
माँ की गोद अभी तक उसका मुझे बोध
अब लाचार खुद बैठने में 
मगर मेरा सिर रखकर गोद में अपनी 
बालों मैं अंगुली फहराती 
दुःख दर्द सरे भूल मैं बालक बन अबोध 
खो जाता माँ के आँचल में 
मन हो जाता मेरा निष्कपट निष्काम 
पहुच जाता बच्चों के धाम 
माँ तो माँ है माँ की कोई नहीं प्रतिलिपि 
दुर्लभ अप्राप्य
भगवान की एक कृति 

त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर' 

No comments:

Post a Comment