इस भाई चारे के पैगाम में शक्ति है अज़ब
एक एक मिलकर हो जातें ग्यारह गज़ब
ईद के मौके में आओ अब हम गले मिले
भूल सरे शिकवा अब एक सदा के लिए हो चले
भूत को भूल भविष्य को रुख करे
हम भारत की है संतान
फिर क्यों छेड़े अलग अलग तान
दुश्मन से लड़े रख कर सामने आन बान और शान
न टपके भारत माँ का आँसूं एक
चाहे कष्ट आये रस्ते में अनेक
हाथों में हाथ
हो ऐसा साथ
किसी की हिम्मत न हो जो उठा सके भारत माँ पर आँख
ईद के मौके में आओ अब हम गले मिले
भूल सरे शिकवा अब एक सदा के लिए हो चले
त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर'
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