उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा में स्वर्गवासी सभी तीर्थ यात्रियों को समर्पित
फटा अस्मां
मिटा सिंदूर
द्वार में नाथ के हो गए अनाथ
मांगने गई थी वर
रहे सुहाग मेरा अमर
बह गये सपने जल के सैलाब में
एक लम्बे सफ़र में
अनंत सफ़र में और सिंदूर साथ में
सूने हो गए वो आँगन
जहाँ सुनाई पड़ती थी पायल की खनखन
उखल की धम धम
बच्चों की किलकारियां
माँ की डांट
दादी का प्यार
और पिता की प्यार भरी गालियाँ
जहाँ चढ़ती थी फूलों की चादर
वहां क्षत विक्षित पड़ी हैं लाशें
जो चढ़ाने आये थे जल
उन्होंने ले ली जल समाधी
हो गया सूना शिव का द्वार
देव भूमि पर ये प्रकृति का कहर
ये हाहाकार
सब ढूढ़ ते अपने अपने रिश्तेदार
इधर लाशे उधर लाशें
हर लाश लगती अपनी रिश्तेदार
हाय उत्तराखंड में प्रकृति का कैसा अत्याचार
मत करो अनादर प्रकृति का
विषधर कहता करो रोपण वृक्ष का
आओ अपने प्रिय की याद में हम सब एक एक वृक्ष लगायें
न दो मौका प्रकृति को की वो फिर इतिहास दोहराये
(त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर')
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