Sunday, 25 August 2013

रिमझिम रिमझिम बरसता पानी

रिमझिम रिमझिम बरसता पानी 
आओ दादी आओ नानी 
जब  पानी  में बहती नाव 
उसमें देखो बच्चों के भाव 
ठुमुक  ठुमुक बहती   नाव
राग एक नया सुनाती  नाव  
बरखा  ने अपना स्वभाव  बदला 
उसके विकराल रूप से दिल दहला 
बहे खेत  और खलियान 
नहीं  बक्शे पहाड़ और मकान 
ताली  बजाकर बच्चे   चिल्लाते
मेरी  नाव सबसे आगे  
कितने ये  नादान  
ये समझते मातम को भी  अपनी शान   
सोने जैसा है  साफ  दिल इनका
इनके दिल में  कोई दाग़  न दिखता   
इनके लिए बरसता  पानी केवल है  रिमझिम  पानी  
चाहे  वो   लिखे उनके जीवन में   मातम की एक कहानी  
'विषधर' कहता अब पछताने से होता क्या
तब कहते थे पेड  कटाने से होता क्या 
और अब कहते  हो वृक्षारोपण से होता क्या
अरे अब तो होश में आ  ऐ  निर्बुधि  इन्सान
अगर चाहत  है बनाना महान 
जीवन में  एक वृक्ष कर दान   

त्रिलोक चन्द्र  जोशी  'विषधर'

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