घन घन करते बादल ये बादल की शहनाई
द्वार खड़े सैया तेरे तू क्यों बोराई
खोल द्वार छोड़ हट
पहचान अपने बालम की आ हट
खोल ऑंखें मन की
महसूस कर चाहत उनकी
ये वही है शहनाई
जब डोली मैं सैय्या ने विदा तेरी कराई
मत शर्मा शमा है तू
अब सावन की शबनम बनजा
छोड़ लाज
अब बालम के दिल से लग जा
(त्रिलोक चन्द्र जोशी 'विषधर')
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